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डॉ. ए. एन. शायलेशा

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दूरभाष सं.
+91 9480-424-706
फैक्‍स
080-2341-1961
व्‍यावसायिक अनुभव
14 वर्ष
एम.एससी., पीएच.डी. (कृषि कीटविज्ञान)
एम.एससी., पीएच.डी. (कृषि कीटविज्ञान)
होमोप्‍टेरन नाशीजीवों के परभक्षियों के लिए बहु उत्‍पादन तकनीकों के विकास पर कार्यरत।
वर्तमान में नाशीजीव और खरपतवारों के प्रबंधन के लिए विदेशी प्राकृतिक शत्रु-कीटों के इंट्रोडक्शंन पर कार्यरत। महत्वपपूर्ण परजीवों और परभक्षियों की अन्योीन्यरक्रिया।
प्रशिक्षण
मधुमक्खी पालन पर 3 दिवसीय प्रारंभिक पाठ्यक्रम - यूएसएस बेंगलुरु।
चींटियों की वर्गिकी पर 3 दिवसीय पूर्व-सम्मेमलन कार्यशाला, यूएसएस बेंगलुरु।
एनएएआरएम हैदराबाद में 40वां FCARPM, दिनांक 21-1-92-30-6-92.
आईआईएचआर बेंगलुरु में बागवानी फसलों में आईपीएम, दिनांक 6-19 नवंबर, 1992.
एनसीआईपीएम नई दिल्लीं में तिलहनों और दलहनों में आईपीएम, दिनांक 1-6 दिसंबर, 2003.
फल नाशीजीवों के सूक्ष्माजीव नियंत्रण में हालिया उन्नएयन - सीएएस - कीटविज्ञान, टीएनएयू, 20 फरवरी-12 मार्च 2006.
पुरस्‍कार और सम्‍मान
नाशीजीवों के कारण त्रिपुरा में संतरे के बगीचों में नुकसान के आकलन की टीम का विशेषज्ञ सदस्यी।
मेघालय के जोवाई जिले में कृंतकों द्वारा किए गए नुकसान की जांच और आकलन टीम का विशेषज्ञ सदस्यो।
मेघालय में नाशीजीवों और रोगों के कारण अदरक फसल में हुए नुकसान की जांच और आकलन टीम का विशेषज्ञ सदस्यग।
मेघालय में नाशीजीवों और रोगों के कारण सुपारी और पान फसल में हुए नुकसान की जांच और आकलन टीम का विशेषज्ञ सदस्य ।
डोनबोस्कोी सोशल सर्विस प्रोजेक्टप के तहत मधुमक्खीु पालन परियोजना में लाभर्थियों का मूल्यांककन विशेषज्ञ।
संक्षिप्‍त उपलब्धियां
गुंडीबग के लिए सुदृढ़ कीटजाल: निष्प्रेभावी केकड़ा/मेढ़क का प्रयोग करते हुए एक ल्यू रिंग ट्रैप अर्थात नाशीकीटों को आकर्षित करने वाले जाल का सुदृढ़ीकरण किया गया और उसे चावल के एक प्रमुख नाशीजीव गंडीबग (लेप्टोजकोरिसा ओरोटोरियस) के प्रबंधन में काफी प्रभावकारी पाया गया, और इस सुदृढ़ आईटीके को मेघालय में 80 प्रतिशत से अधिक चावल उत्पाीदकों द्वारा अंगीकृत किया गया है।
संक्रमित प्ररोहों और फलों की क्लिपिंग जैसी आईपीएम प्रौद्योगिकियों तथा बैंगन फल एवं प्ररोह बेधक नाशीजीव के प्रबंधन के लिए फेरोमोन कीटजाल के उपयोग को मेघालय और त्रिपुरा के किसानों के बीच लोकप्रिय बनाया गया।
कीट-रोगजनक कवक-बीवेरिया बेसियाना, मेटाराइजियम ऐनिसोप्लिए, वर्टिसिलियुम लेकानी और एक निमाटो-फेगस कवक आथ्रोबॉटरिस ओलिगोस्पोकरा की स्था नीय प्रजातियों को वियोजित किया गया।
मेघालय से कीटरोगजनक सूत्रकृमियों की 3 प्रजातियों को वियोजित किया गया और उनका उपयोग चावल एवं मक्कास नाशीजीवों के प्रबंधन के लिए सफलतापूर्वक किया गया।
नीबूवर्गीय तना बेधक के लिए एकीकृत प्रबंधन विधियों का मानकीकरण और प्रचार-प्रसार किया गया।
मधुमक्खी पालन के लिए शीत प्रबंधन का मानकीकरण किया गया और ऐपिस सेरेना इंडिका के लिए उसको लोकप्रिय बनाया गया।
बाँस पुष्पहण और कृंतकों की वृद्धि पर भाकृअनुप तदर्थ परियोजना के तहत, बाँस फलों (केवल 50 वर्ष में एक बार उपलब्धी) का विश्लेपषण किया गया और यह पाया गया कि बाँस में कोई ऐसे कारक नहीं हैं जो कृंतकों की उच्च‍ उत्पअत्ति को बढ़ाती है।
अभिज्ञान
नाशीजीवों के कारण त्रिपुरा में संतरे के बगीचों में नुकसान के आकलन की टीम का विशेषज्ञ सदस्यी।
मेघालय के जोवाई जिले में कृंतकों द्वारा किए गए नुकसान की जांच और आकलन टीम का विशेषज्ञ सदस्यई।
मेघालय में नाशीजीवों और रोगों के कारण अदरक फसल में हुए नुकसान की जांच और आकलन टीम का विशेषज्ञ सदस्यग।
मेघालय में नाशीजीवों और रोगों के कारण सुपारी और पान फसल में हुए नुकसान की जांच और आकलन टीम का विशेषज्ञ सदस्यो।
डोनबोस्कोी सोशल सर्विस प्रोजेक्टण के तहत मधुमक्खीु पालन परियोजना में लाभर्थियों का मूल्यांककन विशेषज्ञ।
प्रकाशन
28
चयनित प्रकाशन
ए. एन. शायलेशा, के. राजसेखर राव एवं के. ए. पाठक 2003. बायोलाजी ऑफ लीफ माइनिंग फ्लीआ बीटल सिबाइथे फुलविपेन्निस (क्राइसोमिलिडा: कोलियोप्टारन) ए मेजर पैस्टप ऑफ असम लेमन इन मेघालया। इंडियन जर्नल ऑफ हिल फार्मिंग, 16 (1 & 2) 35-37.
गीतांजलि एवं ए. एन. शाइलेशा 2002. मेडिसिनल प्लांनट्स ऑफ मेघालया। जर्नल ऑफ द् नॉर्थ ईस्टंर्न काउंसिल, 22 (2&3) : 33-35.
एन. एस. आजाद ठाकुर, गीतांजलि देवी एवं ए. एन. शाइलेशा 2005. निमाटोड्स असोसिएटेड विद वेजिटेबल क्रॉप्स. इन री-भोई डिस्ट्रिक्टा ऑफ मेघालया। इंडियन जे. निमाटोलाजी, 35 (2) : 217-218
लालरामलियेना, अरूण के. यादव एवं ए. एन. शाइलेशा 2005. अफेक्ट्स ऑफ टेम्प रेचर एंड रिलेटिव ह्युमिडिटी ऑन द् इर्मेजेन्सि ऑफ इनफेक्टिव जुवेनाइल्सन ऑफ हेटरोहेबडिटस इंडिका फ्रॉम मेघालया, इंडिया। इंडियन जे. निमाटोलाजी, 35 (2) : 157-159.