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निदेशक की कलम से

हमारे ग्रह में कीट लगभग सभी पारिस्थितिक तंत्रों में बहुलता में पाए जाते हैं। कीटों की आश्च र्यजनक सफलता के पीछे जो कारक हैं, उनमें से एक कारक है उनके शरीर का छोटा आकार होना। इसलिए, रा.कृ.की.सं. ब्यू रो ने इस वर्ष किकिकिहुना, जो कि एक अंड परजीव्याभ है और जो पृथ्वी पर सबसे छोटा कीट है तथा उड़ने में सक्षम है, की खोज की। यह विरल कीट देश के अधिकतर भागों में नहीं पाया जाता है। रा.कृ.की.सं. ब्यू रो द्वारा पिछले वर्ष के दौरान की गई यह खोज एक खजाने की तरह है। ब्यूरो के वर्गिकी वैज्ञानिक नियमित रूप से विशिष्ट कीट जीवों की खोज करने के लिए विभिन्न कृषि पारितंत्रों का सर्वेक्षण करते हैं, जिनमें उत्तर पूर्व, अंडमान और पश्चिमी घाट शामिल हैं। भारत में नहीं पाये जाने वाले कई कीटों (टैक्सा्) की खोज की गई और उनका प्रलेखीकरण किया गया। जिन प्रमुख कीटों का अध्ययन किया गया, उनमें प्लैटीगैस्ट्रोइडिया, माइक्रोगैस्ट्रीने, ट्राइकोग्रामाटिडे, टेफ्रीटिडे, थाइसेनोप्टेरा, फॉर्मिसिडे, माइमैरिडे, एफीलिनिंडे, टैरोमैलिडे, एनसीरिटिडे, स्फीसिडे, एफिडिडे, कोकोइडिया, सेरेम्बाइसीडे शामिल हैं। इन कीट प्रजातियों को रा.कृ.की.सं. ब्यूडरो के संग्रहालय में रखा गया है, जो सरकार द्वारा निर्दिष्ट संग्रह (रिपोजिट्री) है। संग्रह में भारतीय कीटों और देशभर से संग्रहित किए गए कीटों की बारकोडिंग का कार्य भी प्रगति पर है। भारत में पाए जाने वाले कीट रोगजनक सूत्रकृमियों अथवा ईपीएन का एक विशाल संग्रह बनाया गया है। ओसचियस प्रजा., जो द्विपंखी कीटों के प्यूपा पर आक्रमण करता है, का लक्षणवर्णन एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। बरूथी (माइट) कीट का संग्रह भी स्थाणपित किया जा रहा है जिसमें देश के विभिन्न भागों से संग्रहित किए गए बरूथियों को शामिल किया गया है। पशुचिकित्सा और मत्स्य पालन के कीटों के प्रलेखन के लिए एक प्रयोगशाला बनाई गयी है, जिसका श्रेय हमारे माननीय महानिदेशक डॉ. त्रिलोचन महापात्र द्वारा दिए गए प्रोत्साहन को जाता है। कीट वर्गीकरण-विज्ञान में ब्यूरो की विशिष्टता को स्वी कार करते हुए, इनसेक्ट् बायोस्टिेमेटिक्सव पर नेटवर्क परियोजना के साथ समन्वय करने का कार्य इस वर्ष ब्यू रो को सौंपा गया है, और ब्यूकरो के उच्च गुणवत्ता वाले प्रकाशन सभी आईसीएआर संस्थानों के प्रकाशन उत्पादकता सूचकांक की सूची में शीर्षस्थए स्थांन पर हैं।

आक्रामक कीट प्रजातियाँ कृषि के लिए एक निरंतर खतरा पैदा करते हैं| हमारे देश में आक्रामक कीट प्रजातियाँ, जैसे कि पपीता मिलीबग और यूकैलिप्ट गॉल वैस्प, पहले ही प्रवेश कर चुकी हैं जिनका सफलतापूर्वक प्रबंध किया गया है, और उन्हेंए समय पर कार्रवाई करने हेतु उनकी नियमित रूप से निगरानी की जा रही है ताकि उनके भावी प्रकोप को रोका जा सके। इसके अतिरिक्त, देश में प्रवेश कर रहे नए आक्रामक कीटों पर भी लगातार निगरानी रखी जा रही है और भारतीय कृषि में कीटों के प्रवेश को अवरोधित कर, उनके द्वारा पेश किए गए खतरे पर सूचना को नियमित रूप से अद्यतन किया जा रहा है। कीट रोगजनकों (जीवाणु, फफुंद और विषाणुओं, परजीव्याभों, परभक्षियों, ईपीएन को संग्रहित किया जा रहा है, उनका अध्ययन किया जा रहा है और पादप संरक्षण में प्रयोग के लिए उनका प्रलेखीकरण किया जा रहा है। विभिन्न कीटों (टैक्साट) पर ब्यूरो द्वारा होस्टण की गई विभिन्ने वेबसाइटों को लगातार अपडेट कर, उनका विस्ताएर किया गया है जो नि:शुलक उपलब्ध हैं। एशिया में यह एकमात्र स्थान है, जहां 118 से अधिक जीवित कीट अनुरक्षित किया जा रहा है।

डॉ. एन. बक्तडवत्स्लम
निदेशक